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श्री उपुल रंजीत हेवावितानगमगे
Mr. Upul Ranjeet Hevavitangamage
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सन् 1996 से ही आपने पुस्तकें लिखनी शुरु की। श्री लंका में हिंदी भाषा के प्रचार के लिए आपने हिंदी पुस्तकों का सिंहली भाषा में अनुवाद किया तथा हिंदी भाषा के बारे में सिंहली पुस्तकें भी लिखीं ।
आज तक आपने उन्नीस पुस्तकें लिखीं, कई पुस्तकों और कार्यक्रमों का संपादन भी आपने किया है ।
आपके द्वारा लिखी गई पुस्तकें कुछ इस प्रकार हैं :
‘ईद उलेल’ (हिंदी लघु कथाएँ – 1996,2006)
‘हिंदी साहित्य इतिहास : संक्षिप्त परिचय’ (1998,2009)
‘सिरकारिया’ ( हिंदी लघु कथाएँ –1999)
‘नागलंतये जनकथा’ (1999)
‘नुतन सिंहली भाषण व्यवहारये पुरुषवाची सर्वनाम’ (2005)
‘गँवातुर’ (हिंदी - बंगाली लघु कथाएँ – 2006)
‘माच’ (हिंदी लोक नाटक – 2007)
‘ख्याल’ (हिंदी लोक नाटक – 2007)
‘बसंती हवा’ (हिंदी लोक नाटक – 2007)
‘हिंदी साहित्य संवेद’ (हिंदी कविता गद्य संग्रह – 2008)
‘डोगरी’ (लोक कथाएँ – 2013)
‘भील आदिवासी लोक कथाएँ’ (2013)
‘हिंदी लोक कथाएँ’ (2013)
‘पूर्व भारत की लोक कथाएँ’ (2013)
‘मोल्डाविन लोक कथाएँ’ (2013)
‘इस्लोके महत्तया’ (महाश्वेता देवी की बंगला/हिंदी उपन्यास – 2015)
‘गोडसे@ गांधी.कॉम’ (प्रोफेसर असगर वजाहत का हिंदी नाटक – 2015)
‘हतर्मान हंदिए हिटगत मीनिसा’ (हिंदी/बंगला लघु कथाएँ – 2015)
• इनके अलावा विभिन्न पत्रिकाओं में भी आपके अनगिनत लेख प्रकाशित किये गए तथा आपने कई साहित्यिक संस्करणों को सम्पादित भी किया ।
• आपने कमलेश्वर की रचित ‘समुद्र में खोया हुआ आदमी’ नामक हिंदी उपन्यास को ‘स्मुदुरेही अंतरमन वू मिनिसाके नाम से सिंहली में अनुवाद किया ।